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القصيدة
التي
القاها
الشاعر
ايلي غنطوس
في سهرة
نهار العيد |
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بملادِك
طفلَ
المغارة
قد بدى |
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نجمٌ
أضـأتَه
كالمـنارةِ
للهــدى |
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ما زال ذاك
النجمُ
يهدي
نورُه |
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امماً رأت
فيـك
النصـيرَ
القائـدَ
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لم
يخفتِ
النورُ
الذي
ارسلـته |
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سطعاً يضاهي
في البريق
عطارد |
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ارسـلتَه
يهدي
البـرية
كلَّـها |
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انت الذي
اخترت
التـأنس
للفدى |
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فهو
طـريقُ
الخـيرِ
ثبـتَّ به |
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اسسَ
المحـبةِ
والتسـامح
والندى |
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يا
مشـغرة
ابنـاؤك
أتفقــوا |
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في مهجـرٍ
ان
يوثقـوا
العضـدا |
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من
عيدِ
فـادي
الكون قد
جعلوا |
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عيـداً لـهم
في الوفـق
معتـمدا |
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عيداً
لوحدتهم
في ارضِ
مغتربٍ |
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فالربّ
جمّعهمْ
ومضى بهم
صعدا |
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انتم
كملـح
الارض
فانتشـروا |
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بطمـوحـكم
يممتمـوا
كنـدا |
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وحمـلتم
معـكم
عوائـدكـم |
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هذي
العـوائدُ
حفظـها
المـددا |
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والمـرء
لا ينـسـى
منابعـه |
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حتـى عن
الاوطـان
لو بعـد |
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انتـم
لعمـري
خيـرُ
مجتمـعٍ |
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ربُّ
السـماءِ
يزيـدكـم
عددا |
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فتكاثـروا
والــربُّ
حامـيكم |
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لن ينـهزم
مـن كان
مجتهـدا |
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فيكـم
افاخـر لا
اجامــلكم |
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والمـرءُ
لـن يفلـح
اذا جحـد |
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كونوا
لبعضـكم
عونا
وملتجأً |
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كونوا
لأخوتكم
في الشدد
السندا |
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كـونوا
لموطنكم
نبلاً
ومفخرةً |
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كونـوا له
رسلاً
كونوا له
اسدا |
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وابقوا
لضيعتكم
ابناءها
النجب |
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وابقـوا لها
قبسـاً
للعلـم
متقدا |
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